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लेफ्टिनेंट रामा राघोबा राणे का आज पूरा देश कर रहा याद. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान के खिलाफ लड़े. देश के आजाद होते ही पाकिस्तान समर्थित कबायलियों को किया जम्मू-कश्मीर से सफाया. आज पुण्यु तिथि पर पूरा …और पढ़ें
देश का बढ़ाया मान. (News18)
हाइलाइट्स
- लेफ्टिनेंट रामा राघोबा राणे की पुण्यतिथि आज.
- द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के खिलाफ लड़े.
- भारत-पाक युद्ध में परमवीर चक्र से सम्मानित.
26 जून 1918 को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के चेंडिया गांव में जन्मे रामा राघोबा राणे कोंकण क्षत्रिय मराठा समुदाय से थे. उनके पिता सरकारी नौकरी में थे, जिससे राणे की पढ़ाई देश के कई हिस्सों में हुई. बचपन में ही 1930 के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर उनमें देशभक्ति की भावना जागृत हो चुकी थी. साल 1940 में जब द्वितीय विश्व युद्ध अपने चरम पर था, तभी राणे ने भारतीय सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया. 10 जुलाई 1940 को वह बॉम्बे इंजीनियर्स में शामिल हुए. उनकी दक्षता और अनुशासन ने उन्हें बैच का ‘सर्वोत्तम रिक्रूट’ बनाया, जिसके बाद उन्हें नायक और फिर कमांडेंट की छड़ी प्रदान की गई.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा में जापानी सेनाओं से लड़ते हुए राणे ने वीरता की ऐसी मिसाल पेश की कि उन्हें हवलदार बना दिया गया. उन्होंने दुश्मन के गोला-बारूद के ठिकानों को नष्ट किया, अपनी टुकड़ी को नदियां पार करवाईं और सूझबूझ के साथ दुश्मन से पीछा छुड़ाकर सुरक्षित वापसी करवाई. इसके बाद 1947-48 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को अंजाम दिया. उन्हें सेकेंड लेफ्टिनेंट बनाकर जम्मू-कश्मीर मोर्चे पर तैनात किया गया. इस युद्ध में उनका साहस भारत की संप्रभुता और सेना की मर्यादा की रक्षा की कहानी बन गया. उनकी वीरता आज भी सेना के हर जवान को प्रेरणा देती है.
8 अप्रैल 1948 को नौशेरा-राजौरी रोड पर पाकिस्तानी समर्थित कबायली लड़ाकों ने राजौरी पर कब्जा कर लिया था. सेना को वहां पहुंचने के लिए रास्ता साफ करना बेहद जरूरी था. यह काम सेकेंड लेफ्टिनेंट राणे और उनकी यूनिट को सौंपा गया. रास्ते में सुरंगें, पाइन के बड़े-बड़े पेड़, उड़ा दिए गए पुल और दुश्मन की मशीनगनों की गोलियों की बौछार हर बाधा के सामने राणे दीवार बनकर खड़े हो गए. मोर्टार से घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने घाव पर पट्टी बांधी और काम जारी रखा. कई रातें बिना भोजन और विश्राम के, अपनी जान की परवाह किए बिना, वह केवल भारतीय सेना को आगे बढ़ाने में जुटे रहे. उनकी इस अद्भुत वीरता और कार्यकुशलता के लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च वीरता सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से नवाजा गया.
रामा राघोबा राणे केवल एक सैनिक ही नहीं बल्कि एक अच्छे लीडर भी थे, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अपनी टुकड़ी को दिशा दी और आत्मविश्वास भरा. उनका मानना था कि एक सच्चा सैनिक अपने देश के लिए मरता नहीं, वह जीता है ताकि बाकी बचे जी सकें. उनके नेतृत्व में ही भारतीय सेना 12 अप्रैल 1948 को राजौरी तक पहुंच सकी और दुबारा कब्जा किया. भारतीय नौसेना ने करवार स्थित वॉरशिप म्यूज़ियम में उनकी प्रतिमा स्थापित की है. शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने एक तेल टैंकर का नाम ‘एमटी लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे, पीवीसी’ रखा. अपने सेवा काल में उन्होंने पांच बार ‘मेंशन-इन-डिस्पैच’ और आर्मी चीफ से विशेष प्रशंसा पत्र प्राप्त किया.
3 फरवरी 1955 को उन्होंने लीला राणे से विवाह किया और चार बच्चों के पिता बने. 25 जून 1968 को 21 वर्षों की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हुए. उनका जीवन केवल युद्ध की गाथाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक पारिवारिक व्यक्ति, एक प्रेरक और एक सजग नागरिक की भूमिका भी निभाई. 11 जुलाई 1994 को उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन रामा राघोबा राणे आज भी हर उस युवा सैनिक की प्रेरणा हैं जो भारत माता की रक्षा का संकल्प लेता है. उनके बलिदान की गूंज पीढ़ियों तक देशभक्ति का स्वर बनकर गूंजती रहेगी.
पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें
पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और… और पढ़ें

