
महाराष्ट्र के बाद अब बंगाल में भी सियासी भूचाल आ चुका है। एकनाथ शिंदे ने जिस तरह उद्धव ठाकरे की शिवसेना को दो फाड़ कर दिया था, ठीक उसी तर्ज पर बंगाल में भी ‘ऑपरेशन लोटस’ का दूसरा अध्याय शुरू हो चुका है। तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी आज अपने सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो ममता बनर्जी का किला अब ढहने की कगार पर है।
सबसे बड़ा झटका दिया है पार्टी के वरिष्ठ नेता ऋतब्रत बनर्जी ने। ऋतब्रत ने सीधे विधानसभा अध्यक्ष के सामने नेता प्रतिपक्ष पद पर अपना दावा ठोक दिया है। उनका दावा है कि 80 विधायकों में से 70 से ज्यादा विधायक उनके साथ हैं। यह आंकड़ा अगर सही साबित होता है तो ममता बनर्जी के पास सदन में बहुमत का आंकड़ा ही नहीं बचेगा। दल-बदल कानून के तहत दो-तिहाई विधायकों के अलग होने पर अयोग्यता लागू नहीं होती। 80 में से 70 का मतलब साफ है कि टीएमसी का विभाजन अब तकनीकी रूप से भी संभव हो चुका है।
कैसे शुरू हुआ ‘बंगाल का खेला’?
पिछले 6 महीने से टीएमसी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था। अभिषेक बनर्जी को पार्टी में नंबर-2 बनाने के बाद से ही पुराने नेता खुद को दरकिनार महसूस कर रहे थे। टिकट बंटवारे में परिवारवाद, कट-मनी के आरोप, ऋतब्रत बनर्जी का उभार कोई अचानक नहीं है। वे पुराने सीपीएम कैडर से आए हैं और टीएमसी में मजदूर विंग संभालते हैं। उत्तर बंगाल और जंगलमहल के आदिवासी-दलित विधायकों पर उनकी मजबूत पकड़ है। ममता के भतीजे अभिषेक के बढ़ते कद से नाराज चल रहे नेताओं के लिए ऋतब्रत ‘बंगाल के शिंदे’ बनकर उभरे हैं।
आगे क्या होगा ?
ममता बनर्जी के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है। 34 साल के वाम शासन को उखाड़ने वाली ‘दीदी’ आज खुद अपनी पार्टी को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं,’खेला’ जो ममता ने शुरू किया था, उसके खत्म होने का वक्त आ गया है। इस बार खेला होबे नहीं, खेला शेष होबे। टीएमसी का जहाज डूब रहा है और कप्तान के पास कोई लाइफ जैकेट नहीं बची। बंगाल की सियासत में अगले 30 दिन सबसे अहम हैं। शिंदे की तरह ऋतब्रत सफल होते हैं या नहीं !

